<p><strong>नई दिल्ली:</strong> देश में नए मतदाताओं के पंजीकरण और वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) को लेकर उपजे विवाद पर देश की सर्वोच्च अदालत से बड़ी खबर सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सख्त टिप्पणी करते हुए साफ कर दिया कि उसने वोटर रजिस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले 'फॉर्म-6' में किसी भी तरह के बदलाव या संशोधन को कोई मंजूरी नहीं दी है।
अदालत ने तल्ख रुख अपनाते हुए कहा कि जब संबंधित रिकॉर्ड कोर्ट के सामने पेश किए जाएंगे, तब यह परखा जाएगा कि आखिर नियमों के विपरीत जाकर यह संशोधन किसने और किसके अधिकार से किया। कोर्ट ने दो-टूक कहा कि यदि कोई प्रक्रिया गैरकानूनी तरीके से अपनाई गई है, तो उसके परिणाम भी भुगतने होंगे।
क्या है पूरा मामला?
SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग ने फॉर्म-6 में अतिरिक्त बदलाव करते हुए एक नया घोषणापत्र (Declaration) जोड़ा था, जिसके तहत नए मतदाताओं से दो अतिरिक्त जानकारियां मांगी जा रही थीं। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि नियमों को ताक पर रखकर यह बदलाव किए गए, जिससे कई पात्र मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से बाहर होने का खतरा पैदा हो गया। वहीं, दूसरी तरफ चुनाव आयोग ने पिछले दिनों यह दावा किया था कि इस घोषणापत्र को शीर्ष अदालत की ओर से हरी झंडी मिली हुई है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट में क्या हुआ?
दावा खारिज: मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने चुनाव आयोग के उस दावे को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि फॉर्म-6 में अतिरिक्त घोषणापत्र को कोर्ट ने सही ठहराया है।
जवाबदेही तय होगी: कोर्ट ने कहा, “हम बिल्कुल स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि किसी भी संशोधित फॉर्म-6 को हमने अप्रूव नहीं किया है। रिकॉर्ड आने पर हम देखना चाहेंगे कि आखिर यह बदलाव किसने अधिकृत किया।”
फैसलों की वैधानिकता: पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग से सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर पारदर्शी प्रक्रिया की अपेक्षा की जाती है। यदि कोई फैसला मनमाने ढंग से लिया गया पाया गया, तो अदालत उसे रद्द करने में संकोच नहीं करेगी।
हालांकि, कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के कामकाज को लेकर तत्काल कोई अंतरिम आदेश या रोक लगाने से इनकार करते हुए पूरे मामले पर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है।